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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



ग़ज़ल जब जब लिखी रुखसार की


डॉ०प्रखर दीक्षित


ग़ज़ल जब जब लिखी रुखसार की। कीमतें बढ़ गयीं तेरे अशआर की।। तुम झगडती रही मैं मनाता रहा बात बेजा तुम्हारी है तकरार की।। मुझे इमकान है तुम मिलोगी हमें बड़ी उलझी पहेली हो इक़रार की।। तुमको जाना औ समझा चाहा प्रिये जैस्तजू बस तुम्हारे इक दीदार की।। रहा दुश्मन जमाना सभी दौर में ये निशानी मिटाओ न दीवार की।।
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