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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



गज़ल - ऐसे खो जाऊं

डॉ०जया नर्गिस


ऐसे खो जाऊं फिर मिलूँ न कभी अपना ग़म खुद से भी कहूँ न कभी मैं हवा की तरह हूँ साथ तेरे ये अलग बात है दिखूं न कभी आसमां प्यार का बनूं लाहद मैं ज़मीं बनके बंट सकूं न कभी अपनी ग़ज़लों से रौशनी बांटू सिर्फ खुद के लिए जलूं न कभी पाऊँ तौफ़ीक़ अब किताबों में पंछियों के मैं पर रखूँ न कभी खून बनके बहूँ रगों में तेरी और बिछड़ने से फिर डरूं न कभी तेरी बाहों को करके सरहाना ऐसे सो जाऊं के उठूँ न कभी अश्क शामिल हों उसके गर 'नरगिस' प्याला अमरित का भी पियूं न कभी
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