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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



गज़ल-वफ़ाएँ लड़खड़ाती हैं

अशोक अंजुम


वफ़ाएँ लड़खड़ाती हैं भरोसा टूट जाता है ज़रा-सी भूल से रिश्तों का धागा टूट जाता है सलाखें देखकर घबरा रहा है तू परिन्दे क्यों अगर शिद्दत से हो कोशिश तो पिंजरा टूट जाता है परिन्दे वे कभी ऊँची उड़ानें भर नहीं सकते ज़रा-सी धूप से जिनका इरादा टूट जाता है हया आँखों की मर जाए तो घूँघट की ज़रूरत क्या हया मर जाय तो हर एक परदा टूट जाता है यकीं रखना तुम्हारी कोशिशें ही काम आएँगी कि कोशिश रंग लाती हैं कि वादा टूट जाता है लचक रहती है जिन पेड़ों में लम्बी उम्र जीते हैं अड़ा रहने पे तूफ़ानों में क्या-क्या टूट जाता है
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