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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



गज़ल-बात बिगड़ी

अशोक अंजुम


बात बिगड़ी, ऐसी बिगड़ी कि बनाते न बनी ज़िन्दगी रूठी यूँ रूठी कि मनाते न बनी लोग सारे ही लतीफों के तलबग़ार मिले गीत गाते न बनी शेर सुनाते न बनी एक चिनगारी उठी उठ के बन गई शोला आग फिर ऐसी लगी हमसे बुझाते न बनी संगदिल वक़्त ने की दिल्लगी यूँ शामो-सहर दूर जाते न बनी सिर को बचाते न बनी हमने कुछ इस तरह से कर लिए करार कभी बोझ काँधों पे लदे और उठाते न बनी
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