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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



गज़ल-अब के आफ़त ऐसी बरसी

अशोक अंजुम


अब के आफ़त ऐसी बरसी दीवारो.दर टूट गए इस बारिश में जाने कितने मिट्टी के घर टूट गए लोगों की जां ले लेती है कभी.कभी इक ठोकर भी और कभी जिस्मों को छूकर तीखे खंज़र टूट गए कुछ तो है जो सच की ख़ातिर सारे नियम बदलता है शीशे से टकराकर वरना कैसे पत्थर टूट गए जब तक हम अपने थे तब तक सपने थेए उम्मीदें थीं ऐ रहबरए सच कहते हैं हम तेरे होकर टूट गए आता नहीं सलीका सबको सुनने का और गुनने का बेशऊर लोगों में आकर सच्चे शायर टूट गए ऐसी साज़िश वक़्त रचेगा हमको ये मालूम न था रफ़्ता.रफ़्ता इन आँखों के दिलकश मंज़र टूट गए आखिरतः वो जा ही पहुँचा 'अंजुम ' वहाँ बुलन्दी तक जाने दो जो इस रस्ते पर पंछी के पर टूट गए
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