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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



मैं तो वही हूँ

डॉ० अनिल चड्डा


मैं तो वही हूँ, तुम ही बदल गये, बहकने से पहले ही संभल गये । फितरत यही है ज़माने की यारो, गिरे हुओं को और मसल गये । हम कह ही न पाये दिल की जुबां से, उन्ही की बातों से फिसल गये । जो आती हमें भी चालाकी जग में, न लगता तुम्हे, बेकार निकल गये । लगता बड़ा खूबसूरत था ज़माना, सच्चाई जो देखी, हम तो दहल गये ।
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