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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



सोरठा - दोहा गीत
“संबंधों की नाव”



आचार्य संजीव वर्मा सलिल


संबंधों की नाव, पानी - पानी हो रही। अनचाहा अलगाव, नदी-नाव-पतवार में।। * स्नेह-सरोवर सूखते, बाकी गन्दी कीच। राजहंस परित्यक्त हैं, पूजते कौए नीच।। नहीं झील का चाव, सिसक रहे पोखर दुखी। संबंधों की नाव, पानी - पानी हो रही।। * कुएँ - बावली में नहीं, शेष रहा विश्वास। निर्झर आवारा हुआ, भटके ले निश्वास।। घाट घात कर मौन, दादुर - पीड़ा अनकही। संबंधों की नाव, पानी - पानी हो रही।। * ताल - तलैया से जुदा, देकर तीन तलाक। जलप्लावन ने कर दिया, चैनो - अमन हलाक।। गिरि खोदे, वन काट मानव ने आफत गही। संबंधों की नाव, पानी - पानी हो रही।।
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