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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



गीत - "देश-हितों हित"


आचार्य संजीव वर्मा सलिल


देश-हितों हित जो जीते हैं उनका हर दिन अच्छा दिन है। वही बुरा दिन जिसे बिताया हिंद और हिंदी के बिन है। * अपने मन में झाँक देख लें क्या औरों के लिए किया है? या पशु, सुर, असुरों सा जीवन केवल निज के हेतु जिया है? क्षुधा-तृषा की तृप्त किसी की, या अपना ही पेट भरा है? औरों का सुख छीन बना जो धनी कहूँ सच?, वह निर्धन है। * जो उत्पादक या निर्माता वही देश का भाग्य-विधाता, बाँट, भोग या लूट रहा जो वही सकल संकट का दाता। आवश्यकता से ज्यादा हम लुटा सकें, तो स्वर्ग रचेंगे जोड़-छोड़ कर मर जाता जो सज्जन दिखे मगर दुर्जन है। * बल में नहीं मोह-ममता में जन्मे-विकसे जीवन-आशा। निबल-नासमझ करता-रहता अपने बल का व्यर्थ तमाशा। पागल सांड अगर सत्ता तो जन-गण सबक सिखा देता है नहीं सभ्यता राजाओं की, आम जनों की कथा-भजन है
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