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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



मन स्वयं बारात हुआ


हरिहर झा


गहरी नींद लगी सोया तो मैं स्वयं ही रात हुआ प्यास पी गया बादल बन कर मैं स्वयं बरसात हुआ बंसी की धुन सुन अंतस में कितना आनंद समाया खिलते स्वर की हुई बिछावट स्थल नभ सब ने गाया शांति अमन जो दुल्हन थी तो दिल का देव बना राजा झंकृत होती तंत्री ढोल की थपकी पर बजा बाजा नाच नाच खुशियों से मेरा मन स्वयं बारात हुआ दर्द सहा जब दुखियों का तो पीड़ा नस नस में छाई प्यार हुआ सुलझन से इतना उलझन ने उलझन पाई मधुर मधुर गाती लहरें जब मेरे मन की मीत हुई स्पंदन बनी वेदना फिर तो पीड़ा खुद संगीत हुई बिजली कौंधी विलिन हुई, खुद घावों को आघात हुआ तरस गया मुस्कान न आई, मजा लिया बस रोने में आँसू में बहता, बचने को ठाँव मिला ना कोने में लगा पंख उड़ना चाहा तब, फैला मैं आकाश हुआ छुप न सका तो तन कर देखा शत्रु का पल में नाश हुआ जीतता हार हार कर यों खेल स्वयं ही मात हुआ
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