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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



ग्रहण

डॉ० अनिल चड्डा


ताण्डवी निशाचरी को हो रहा अर्पण सवेरा ! मेरे घर की चांदनी पर छा गया काला लुटेरा !! जल रहा है, जल रहा है, आज सब कुछ जल रहा है, आदमी का खून पी कर आदमी ही पल रहा है, ज़हर खा कर नफरतों का, खुद ही खुद को डस रहा है, देख भाई को ही मरता, आज भाई हंस रहा है, किस की बातों से है बहका, प्रेम ज्योति का चितेरा? ताण्डवी निशाचरी को हो रहा अर्पण सवेरा ! मेरे घर की चांदनी पर छा गया काला लुटेरा !! हो गई ओझल दिशाएँ, आज बहकी हैं हवाएँ, जो कभी होते थे रक्षक, वो ही अब भक्षक कहाएँ, फूल बन डाली था खिलना, वो ही अब काँटे चुभाएँ, क्या यही हमने पढ़ा था, मात के टुकड़े बटाएँ? त्यागमूर्त को सिखाया, आज किसने तेरा-मेरा? ताण्डवी निशाचरी को हो रहा अर्पण सवेरा ! मेरे घर की चांदनी पर छा गया काला लुटेरा !!
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