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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



होगा इसी पर तू फ़िदा

डॉ० अनिल चड्डा


सोता हूँ हर रोज मैं प्रार्थना करके यही, सरहद के रक्षक की प्रभु रक्षा करना तू सदा । सुबह सवेरे उठ के भी मांगता हूँ मैं यही इस देश की मिट्टी को प्रभु खून से लेना बचा । तेरा रूप मैं देखूँ उन्ही में, जो खड़े सरहद पे हैं, इक तू है, इक वो हैं जो हमको बचाते हैं सदा, बस मांगता हूँ ये, न हो मुश्किल से उनका सामना । कुर्बानियों का देश है, कुर्बानी तेरी रग-रग में है, जहाँ बढ़ा दे तू कदम, विजय ही तेरे पथ में है, बस सोचता है देश की, नहीं और कुछ भी है पता । दीवानगी में देश की, करता नहीं कुछ तू परवाह, मात-पिता और बंधू-बांधव, किसी से कुछ न वास्ता, इस देश में तू जन्मा है, होगा इसी पर तू फ़िदा ।
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