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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 96,नवम्बर(प्रथम), 2020

फिर कभी...

मुरलीधर वैष्णव

एक विषाणु ने पूरे विश्व में तबाही मचा रखी थी। डबल ड्यूटी कर, दिन भर का थका हारा, सुकून और कर्तव्य-दृढ़ता से लबालब, अपनी जान की परवाह किये बिना करीब एक दर्जन मरीजों को रोग मुक्त कर चुका, डा. त्यागी रात में ग्यारह बजे घर पहुंचा ही था कि उसके मोबाइल की रिंगटोन बज उठी। उधर से मौत का कॉल था। कह रही थी ‘‘ठीक बारह बजकर तेरह मिनट पर मैं तुझे लेने आ रही हूं।‘‘ वह कुछ नहीं बोला। घड़ी में अलार्म भर कर सो गया।

नियत समय पर मौत ने जब उसकी गली में प्रवेश किया तो उसने देखा कि वह अपने घर के बाहर, बाहें फैलाए, उससे गले मिलने के लिए स्वागतातुर खड़ा मुस्करा रहा है।

‘‘ मैं तैयार हूं, लेकिन मेरी अंतिम ईच्छा है कि मरने से पहले कुछ और मरीजों का ईलाज कर उन्हें बचा सकूं। आगे आपकी मर्जी।‘‘ वह मौत से बोला।

यह अविश्वसनीय दृश्य देख कर मौत चकित रह गई। कुछ सोच कर मुस्कराते हुए वह लौटने लगी। लौटते हुए उसने मुड़ कर डा. त्यागी पर एक नजर और डाली। उसे उसी प्रसन्न मुद्रा में खड़ा देख इशारे से उसे कहा ‘‘आज नहीं, फिर कभी।’‘


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