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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 96,नवम्बर(प्रथम), 2020

दिवाली-पूजन

मुरलीधर वैष्णव

‘देखो, सवा छः बज गये है। शाम सात बजे का लक्ष्मी-पूजन मुहूर्त है, जल्दी आना। सभी साथ ही पूजा करेंगे।’ पत्नी ने मेरे स्कुटर के आगे की बास्केट में अनाथाश्रम के बच्चों के लिए कुछ मिठाई व पटाखे रखते हुए कहा। ‘जल्द ही आता हूं’ कह कर मैंने स्कुटर के किक मारी।

उन दिनों मेरे पास किशोर न्यायालय के मजिस्ट्रेट पद का भी प्रभार था। मेरी कोई ड्यूटी न होने पर भी रुचिवश वहां के अनाथाश्रम के बच्चों से मिलने मैं प्रायः जाया करता था। छुट्टी के दिन उनसे घंटों बतिया कर उनके अतीत की जानकारी लेता। उनके भविष्य-चिंतन को लेकर कुछ करते रहने से मुझे सुकून मिलता था। बच्चे भी मुझे प्यार व आदर देने लगे थे। यहां त्यौहार पर अधिकांश बच्चे अपने दूर के रिश्तेदारों के यहां चले जाते हैं।

अनाथाश्रम पहुंचने पर पता चला कि वहां का चैकीदार तक नदारद था।

‘अभी कित्ते जने हो यहां ? मैंने अनाथाश्रम के विकलांग बालक मन्नु से पूछा।’

‘सर, हम तीन ही हैं।’

‘बाकी दो ?’

‘मोहन और इकबाल उस कमरे में हैं। ...सर, इकबाल की तबियत बहुत खराब है’। उसने कमरे की ओर इशारा किया।

मैं दौड़कर कमरे में गया। वहां देखा कि इकबाल तेज बुखार और पीड़ा-वश कराह रहा था। मोहन ने बतलाया कि उस की जांघ में फोड़ा है। मैंने उसका फोड़ा देखा तो वह पक कर एक बड़ी-सी पिलपिली गांठ का रूप ले चुका था। मैंने मिठाई-पटाखे वहीं रखकर मोहन व इकबाल को मेरे स्कुटर के पीछे बैठाया और सरकारी अस्पताल- परिसर में रह रहे मेरे परिचित सर्जन के घर पहुंचा। डाक्टर व उसका परिवार उस समय लक्ष्मी-पूजन के लिए तैयारी कर रहे थे। डॅाक्टर उन बच्चों के साथ मुझे इस हाल में देखकर चौंक उठे।

‘‘सर आप ?‘‘

‘डियर, पहले इस बच्चे को देखो, इट’ज़ अर्जेंट।’ मैंने डाक्टर से निवेदन किया।

‘फोड़े में इंफेक्शन हो गया है। काफी मवाद भर गई लगती है, चीरा लगाना पड़ेगा... लेकिन मेरा तो कंपाउन्डर भी यहां नहीं है, सर।’ डाक्टर ने मोहन के फोड़े की जांच कर कहा।

‘मैं हूं ना ! आज मैं आपका कंपाउन्डर बन जाता हूं। कहो, मुझे क्या करना है !’

‘बस सर, आप इस ट्रे को इस बच्चे के फोड़े के नीचे लगाये रहे।’ डाक्टर की मुस्कराहट में मेरे प्रति गर्व झलक रहा था।

डाक्टर ने उस फोड़े पर जैसे ही चीरा लगाया, उसमें से मवाद व खून की एक पिचकारी सी छूट पड़ी। वैसे तो वह सब मैंने उस ट्रे में भर ली थी, लेकिन कुछ छींटें मेरी शर्ट पर भी लग गये।

इकबाल का ईलाज करा कर जब मैं घर पहुंचा तब कोई साढ़े नौ बज गये थे।

‘‘अब आ रहे हो आप ? इतनी देर कहां लगा दी ? आज लक्ष्मी- पूजन का भी ख्याल नहीं रहा आपको ? पत्नी क्रोधवश चिनगारियों के साथ पटाखे-सी फट पड़ी। मैं उसे तुरंत तो क्या कहता, फिलहाल स्नान करने के लिए बाथरूम में घुस गया।


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