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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

जीत अंगुली की...

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'

मि. सुजान पर पिछले कई महीनों से स्वार्थ ने कुछ ज्यादा ही शिकंजा कस रखा था उसका मन आजकल आठोयाम स्वार्थ-स्वार्थ ही जपता रहता था ।मि.सुजान अपनी स्थाई विचार धारा के विरुद्ध जब बोलते तो लोगों को आश्चर्य होता । आज चुनाव थे जल्दी-जल्दी तैयार होकर वो बूथ पर पहुँच गए । वहाँ लम्बी लाइन लगी हुई थी लाइन में भी मि.सुजान चर्चा में कई तर्क-कुतर्क करते हुए अपनी बात रख रहे थे । नम्बर आने पर जब उनने अपने को वोट मशीन के सामने पाया तो पता नहीं क्यूँ ,अंगुली विद्रोही हो गयी और उसने आव देखा न ताव उस बटन को दबा दिया जिसे स्वार्थी मन दबाना नहीं चाहता था । मि.सुजान धीरे-धीरे बूथ से बाहर निकले लोग उन्हें छेड़ने का प्रयास करने लगे पर वे मुस्कुराते हुये घर चले गये... 'इस अनौखे युद्ध में अंगुली की जीत हुई और स्वार्थी मन की हार...,


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