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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

तेरहवीं

शबनम शर्मा

शाम को एक छोटा सा कार्ड बिना दरवाज़ा खटखटाए कोई फेंक गया। रात को मुन्ना हाथ में लिये मुझे दिखा रहा व बोला, ‘‘अम्मा, पिछली गली वाली दादीजी की तेरहवीं है। कल दोपहर का खाना है व 2 से 3 बजे तक पगड़ी की रसम।’’ उसके बताते ही मेरे शरीर में बिजली सी कौंध गई। मेरा अच्छा-खासा प्यार था उनसे। दूसरे दिन मैं समयानुसार उनके पिछले वाले बड़े से आँगन में पहुँच गई। बड़ा सा शामियाना, आज़ाद टैंट वालों का इन्तज़ाम। खाना सजा हुआ, लोग घूम-घूमकर चटकारे लेकर खाते हुए। सिर्फ कमी थी तो ये कि डी.जे. के अष्लील गानों पर लोग नाच नहीं रहे थे। माहौल चुपचाप खाकर, लिफ़ाफा पकड़ाकर जाने का था। कोने में खड़ी-खड़ी मैं ये दृष्य देख रही थी कि अचानक मेरा ध्यान दादी की उस स्थिति पर चला गया, जब मैं उन्हें आखिरी बार मिलने गई थी। ढीली खाट, जिस पर बिछी चादर न जाने कब बिछाई गई थी। गुच्छा-गुच्छा होकर दादी के बदन को तंग कर रही थी, दादी कभी इधर से सीधी करती कभी उधर से। तकिया बेहाल था। कमरे में ज़ीरो वाॅट का बल्ब था। न कोई खिड़की, न झरोखा। पास में एक प्लास्टिक की टूटी बालटी पड़ी थी। सुबह-सुबह पानी का लोटा, गिलास रख दिया जाता। लाख आवाज़ें देने पर भी कोई न आता। हरिया भागता-भागता कभी-कभी चाय का गिलास, दो रस दे जाता। दादी बेचारी हाँफती-हाँफती उठती, मुष्किल से नहाती, धोती, अपने अस्त-व्यस्त बाल अपने हाथों से सुलझाती। कभी किसी से कोई षिकायत न करती। कोई हाल पूछता तो कहती, ‘‘बेटा बुढ़ापा ही तो सबसे बड़ी बीमारी है।’’ तरस आता उन्हें देखकर। किसी के पास वक्त न था उन्हें कुछ पूछने का, उनकी सेवा करने का, पर आज ये लाखों रूपये खर्च कर दिखावा क्यूँ?


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