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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

हित-नाता

राजीव कुमार

उसको अंत तक यही लगता रहा कि मैं रिश्तों के मकड़जाल में फंस चुका हूं, पिता को अपशब्द बोलकर और माता की मर्मस्पर्शी ममता का फायदा उठाकर घर से निकल गया और उसके मुख से यही वाक्य निकले थे ’’ मैं खुद को रिश्तों के दलदल से उबार लूंगा।’’ उसके भाई-बहन तो उसका मुंह ताकते रह गए।

काफी साल गुमनामी में गुजारने के बाद उसकी रिश्तेदारी धन-दौलत से हो गई। नौकर-चाकर और लालची मित्रों की रिश्तेदारी में खुद को असहाय महसूस करने लगा। सारे लोग मतलबपरस्त और मौकापरस्त थे। घर की याद आती तो उसके झुठे अहम के तले दब जाती। अब उसके रिश्तेदार हेरोइन, गांजा और विभिन्न मादक पदार्थ हो गए। ये वैसे रिश्तेदार थे जो गले लगते ही चिपक कर सो जाते थे। ये वो रिश्तेदार थे जो चैन और सुकुन देने का वादा करके बैचेनी और बेताबी बढ़ाते थे, अंत में उसने महसूस किया कि रिश्तों के मकड़ाजाल में तो अब फंसा हूं, जहां से निकल पाना बहुत मुश्किल है।

घर परिवार की खऱी-खोटी और मीठी-मीठी बातें मन-मस्तिष्क पर हावी होते ही अपने घर लौट आया।


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