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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

बोहनी

राजीव कुमार

शमशान घाट में बोहनी के लिए भुटका अपनी बारी की प्रतिक्षा कर रहा था कि एक शव आते के साथ राम-नाम सत्य है की आवाज के साथ लोग घाट में दाखिल हुए। इसस पहले कि भुटका दौड़ता उसका मित्र दौड़ गया। भुटका ने अपने चेहरे पर भस्म और कान के उपर जलती अगरबत्ती रखते हुए आकाश की ओर देखा और बुदबुदाया ’’ भगवान आज क्या मेरे परिवार को भूखे रखने का मन है? ’’ बहुत देर बीत जाने के बाद राम-नाम सत्य है की आवाज के साथ शव लिए आते लोग दिखे, भुटका ने महसुस किया कि सब उसी की तरफ आ रहे हैं। एक आदमी ने आकर पूछा ’’ पवित्रा कहां है? हमलोग उसी से क्रिया-क्रम करवाते हैं।’’

भुटका इस बार अंदर तक झल्ला गया और पेड़ की तरफ इशारा करके उसका पता बता दिया। मगर भुटका ने कहा ’’ उस से कम में करवा देंगे।’’ लोगों ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उसके मन में तरह-तरह के विचार आने लगे, कभी किसी से मोल मोलाई नहीं किया, जिसके पास नहीं था उसका भी काम करवा दिया। फिर आज ऐसा क्या? फिर थोड़ी देर ही देर में कुछ लोग भुटका की तरफ बढ़े चले आ रहे थे। भुटका ने नजर फेर ली कि हो न हो लोग किसी दूसरे के बारे में पूछेंगे। इस बार सचमुच भुटका के पास ही लोग आए थे, बोहनी की पूरी गुंजाइश थी। शव के साथ आए लोग बहुत परिचित से लगे। चेहरे पर से कफन हटते ही उसको भक मार गया, शव उसके फुफेर भाई की थी। भुटका के शोक में डूब जाने के साथ ही क्रिया-क्रम के लिए दूसरे को दाव मिल गया। अब भुटका को अपनी बोहनी का कोई होश न था।


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