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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

एक आत्म लघु कथा - भिखारन

दीप्ति शर्मा (दुर्गेश)

एक दिन मैं और मेरे कुछ मित्र एक मंदिर क दर्शन करने गए| हम मंदिर में परवेश कर रहे, तो दो भिखारन मंदिर क दरवाजे पर बैठी हुई थी | जब हम वापस मंदिर से दर्शन करके लौट रहे थे | तभी उन दोनों भिखरन में से एक ने मेरा बेग पकड़ लिया और बोली के बेटा कुछ खाने को दे दो सुबह से भूखी हूँ| तो मैने अपने बेग से टिफ्फन निकाल कर उस औरत को दे दिया | और वो औरत मेरे सर पर हाथ फेरकर मुझे आशीर्वाद देने लगी के बेटा खूब तरक्की करो , खुश रहो खूब नाम कमाओ और भी बहुत कुछ | फिर दूसरी भिखरन भी मुझसे खाना माँगने लगी अब क्योकि मेरे पास खाना नहीं था इस लिए मैंने अपने बेग से १० रुपये निकाल कर उसे दे दिए| पहली भिखरन की तरह ये भी मुझे आशीर्वाद देने लगी | उस दिन मैंने जाना के आज पैसो के बाजार में दुआये बहुत सस्ती बिकती है |

सीख़ - इसलिए बेशक किसी पैसेवाले इंसान को १०० रुपये कम दे दो ,लेकिन किसी भिखारी को दो रोटी जरूर खिलाओ , और क्योकि जो असर दुआए कमाने में है वो पैसो कमाने में नही है |


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