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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



कुछ अंतर्मन की बात


स्नेही "श्याम"


कुछ अंतर्मन की बात:-

जो जानना चाहें दिल खोलकर जानें
और न जानना चाहें, भूलकर भी न झांकें-

आजादी के बाद राजनीति की उबड़-खाबड़ समतल जमीन पर अनाजों की नहीं, जांबाजों की खेती हुई है इस देश में। गद्दार राष्ट्रभक्तों के वेष में। उपजते रहे सेवा के नाम पर मेवा बटोरनेवाले बिगड़ैल साहबजादे शौकिया सेवक।

समस्याओं को सुलझानेवाले सपनों की निकाई-गुड़ाई, रोपाई-बुआई और कटाई बखूबी होती रही है। देश के खेतों और खलिहानो में पककर तैयार होते रहे नेतानुमा फसल। बेशक, ऐसे अनाजों के पौष्टिक तत्त्व के रूप में उभरे वादाफरोश, दलालों के गली-कूचेवाले रंगदार छुटभैये की ढेरी। जो खेत-खलिहानों की करते रहे पहरेदारी। शीर्ष-सत्ता तक पहुँचाने की गारंटी के साथ।

खलिहानों में तैयार फसल के रूप-रंग, आकार-प्रकार, जाति-वर्ण और गुण-धर्म बेशक अलग-अलग हों या यूँ कहें- जातिवाचक संज्ञा के साथ विशेषण के रूप में समझें तो स्पष्ट हो जाता है कि- फसल चाहे जो भी हो आखिर पेट भरने के काम ही आता है। भूखा पेट कुछ भी चबा लेता है। भूख की ज्वाला ही कुछ ऐसी होती है कि कुछ भी खा लेती है और उस भूखे भेड़िये की आतें बिना शक-सुबहा के पचा भी लेती है। चाहे लोहा- कोयला, मिट्टी-रेत-पत्थर ही क्यों न हो। पाचन तंत्र भी कमाल का जो देश-दुनियाँ के लिए नायाब नमूना है। बारूदों के ढेर पर टिकी दुनियाँ हैरान-परेशान ही नहीं आश्चर्यचकित भी है।

हमें ही नही हम सब को फख्र है अपने इस भारत देश पर, देश के नैतिक परिवेश पर, देश में लह-लहाती राजनैतिक इच्छा-शक्ति और देश-भक्ति पर। यह देश पहले भी विश्वगुरु रहा है और आजादी के सत्तर साल भी किसी न किसी मायने में, विश्व के आईने में, अपना अक्स दिखा रहा है और दिखाता भी रहेगा। चाहे क्षेत्र अपहरण-बलात्कार का हो या अराजकता के अंधकार का या फिर, आम लोगों को उल्लू बनाने के इश्तेहार का। भारत विश्वगुरु था, है, और रहेगा। तुम हमें खून-पसीने दो, मैं तुम्हें आजाद भारत में ऐसी आवादी दूँगा। जिसे देखकर दुनियाँ दाँतों तले उंगली चबायेगी। जय-हिंद-जय-भारत।


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