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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



“खिचड़ी” रास्ट्रीय कल्चर घोषित हो


राजेश भंडारी “बाबु”


बड़ी ख़ुशी की बात हे की खिचड़ी को रास्ट्रीय फ़ूड घोषित किया जा रहा हे | घर में जब भी खिचड़ी बनती तो पापा हमेशा कहते थे अपने घर में क्या बनता हे सब को रोज नहीं बताना नहीं तो मोहल्ले वाले कहेंगे “खिचड़ी वाले” अंकल जी, क्योकि मोहल्ले में कुछ लोग तो खिचड़ी के नाम से ही फेमस हुवा करते थे | अब रोज रोज क्या बनाओ ये समस्या तो पुरे देश की हे हर गृहणी की आधी जिन्दगी तो ये रटते हुवे गुजर जाती हे की आज क्या बनाऊ | ये इनको नहीं भाता ,ये सासुजी को नहीं भाता सो सब का सीधा सा इलाज हे “खिचड़ी” | वेसे खिचड़ी का कोई स्पेसिफिक रेसिपी नहीं हे पर जो बचा खुचा हो सब इसमें डाल सकते हे | जब से एकल फेमिली का विस्तार हो रहा हे बेचारा पति आधे टाइम ईसी डिश को एन्जॉय करने का नाटक करता हे और कोई चारा भी नहीं हे मेडम भी वर्किंग हे तो खाना बनाये कोन जब भी कोई प्रॉब्लम हो एक ही आवाज “खिचड़ी” | वेसे हमको रास्ट्रीय कल्चर के बारे में भी सोचना चाहिये तो क्यों न खिचड़ी कल्चर को ही रास्ट्रीय कल्चर घोषित किया जावे क्योकि खिचड़ी कल्चर के कारण ही आजकल अंतरजातीय विवाह भी हो रहे हे कही की इट और कही का रोड़ा , कही की सास कही का साला ,पिता की दूसरी शादी ,माँ का दूसरा पति ,ये पहले वाले पति की संतान , न माँ असली न बाप असली इन सब मिला कर परिवार बना लेते हे पर जाने अनजाने में हम लोग इस खिचड़ी कल्चर को अडॉप्ट कर चुके हे और हालत ये हे की किसी भी घर में जावो आधा हिंदुस्तान के दर्शन हो जावेंगे परिचय ऐसे देंगे ये हमारे कनाडा वाली आंटी अरे अभी तो शादी हुई इंडिया के बारे में पता नहीं हे इनको और ये पंजाबी बहु हे बेटे के साथ बेंगलोर में काम करती हे अब बच्चो का आज कल ऐसा ही हे और हा हमारी बेटी की भी शादी फिक्स कर दी हे वो असल में कश्मीरी पंडित हे मतलब रिश्तो में भी खिचड़ी कल्चर पुरी तरह से घुस चूका हे | राजनीति की बात करो तो ना विचारधारा ,न सिधांत ,न कोई चरित्र,न चाल , न कोई लायलटी बस अपना फायदा और कुछ भी करो | खिचड़ी के चावल की तरह से राजनीति के पुराने चावल भी दूसरी खिचड़ी में घुसने की जुगत में लगे रहते हे समाजवादी दल और समाजवाद का नामो निशान नहीं बस बनाओ खिचड़ी | बहुजन दल अल्पजन के हित के लिए काम करती हे कभी समाजवाद से मिल जाती हे और कभी किसी और से बस जेसे तेसे खिचड़ी बनाओ और मजे लो | एक भिया तो सबकी पोल खोल खोल के आये और जब अपनी पोल खुलने लगी तो चुप बेठ गए और लगे खिचड़ी बनाने में | खिचड़ी में रहने का सबसे बड़ा फायदा ये के भिया कोई जवाबदारी नहीं कुछ भी हो तो भिया खिचड़ी सरकार हे किसको क्या बोलो | जो दल का आधार नहीं बने वो खिचड़ी बनाने के लिए तैयार | राम लाला क्यों नहींबेठे अभी तक तो भिया हमारी तो खिचड़ी सरकार थी मतलब कही भी हाथ झटकना हो तो खिचड़ी कल्चर अब ये तो हम भारतीयों की किस्मत हे की जादा तक राजनितिक घराने ही खिचड़ी कल्चर की देन हे तो हम किस किस को दोष दे तो भिया अपन भी निवेदन करे के खिचड़ी कल्चर को भी रास्ट्रीय कल्चर घोषित कर दिया जावे और जितने भी कही के इट और कही के रोड़े हे उनको भी खिचड़ी की मुख्य धारा में जोड़ दिया जावे |


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