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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



“पचरंगो मालवो “ द्वारा मालवी दिवस मनाया गया


  

इंदौर , इस अवसर पर पचरंगो मालवो समूह संयोजक श्री राजेश भंडारी “बाबू” के संचालन में अभिनव आयोजन हुआ जिसमे काव्यपाठ का शुभारम्भ करते हुवे भंडारी बाबू ने मालवी का गोरव गान किया ...घनो घनो प्यारो हे मालवो ने घनी मालवी दुलारी हे , दादाजी की लाड़ली और दादी जी की प्यारी मालवी हे और भाषा अपनी बोलिए जो चाहिए सम्मान मालवी वोले लोग तो मालवा को हे मान ....इसके अलावा अपनी भाषा छोड़ कर पर भाषा अपनाय ऐसे पूत को देख के मालव माटी लजाय सुनाई | फिर "उड़े उड़े रे गुलाल म्हारा मालवा में" सुना कर लोगो को सम्मोहित कर दिया | "वारे दादा जेटली भारी थारी बजट की पोटली" और "आस्तीन के ओटी रखो या छोटी रखो" पर खूब दाद बटोरी | स्थानीय महावीर नगर उद्द्यान में मालवी के प्रबुद्द मालवी बोली प्रेमी साहित्यकारों द्वारा गुड़ी पडवा को मालवी दिवस के रूप में मनाया गया और पचरंगो मालवो ग्रुप की शुरुवात की |शिखर सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार श्री वेद हिमांशु के मुख्य आतिथ्य में कार्यक्रम की अध्यक्चता पूर्व प्राचार्य और वरिष्ठ समाजसेवी श्री मनोहर भंडारी ने की | इस अवसर पर कार्यक्रम को संबोधित करते हुवे श्री वेद हिमांशु ने कहा की मालवी दिवस वास्तव में मालवी संस्कृति और मालवी लोक सवेदना का दिवस हे |यह हमारे घर आँगन और मालवा के चूल्हे चोक का सम्मान दिवस हे | वेद हिमांशु जी ने अवसरवाद और बाजारवाद पर बोलते हुवे “ नवा जमाना को यो कई कायदों दादा तम म्हारे राय दो सुना खूब दाद बटोरी | मालवी में एक कहानी (बारता ) भी सुनाई ,कार्यक्रम का आभार प्रदर्शन श्री महिपाल जैन ने किया |

मालवी पोथी सुकृति : मालवा की नदिया

बेंगलोर मे “पचरंगों मालवों”मे एक पुस्तक पर भी चर्चा हुई | श्री गोरीशंकर जी दुबे साहब ने म्हारे के पुस्तक भेट करी जीको शिर्षक हे “सुकृति” जो पंडित किशनलाल दुबे स्मृति ग्रंथ हे जो मालवा की नदिया पे श्री दशपुर प्राच्य शोध संस्थान , मंदसौर द्वारा प्रकाशित करयो गयो हे | संयोजक मण्डल मे पंडित भवानी शंकर जी दुबे और पंडित गोरिशंकर जी दुबे और डॉ भोलेश्वर जी दुबे हे |प्रथम खंड मे एक से एक सो पचास पेज मे घना अच्छा अच्छा गीत,कविता जो घना घना ज्ञान की बाता से भरी हुई हे बाची के घनो आनंद आयो | 1957 मे सीतामाउ की घटना पे आधारित .....हिन्द देश मे कस्तना ने जात पात सब मेटी दी,खानो पीनो बटार दियो ने गऊ की गर्दन काटी दी ...खूब अछि रचना हे | हितमू मे शांति व्हई गयी ,गाया खजाना बंची गया की भावना आपण समजी सका |द्वितीय खंड मे मालवा की नदिया को बखान करियों हे | जेसो के संत कबीर ने मालवा का बारा मे लिखियों हे की मालव माटी गहन गंभीर पग रोटी और डग डग नीर तो नीर मालवा मे भरपूर रियो हे | और मालवा की सीमा भी “ इत चम्बल उत बेतवा मालव होय सूजान…. दक्छिन दिसि हे नर्मदा मालव सीमा जान |इनी पुस्तक मे नर्मदा,बेतवा,हलाली ,बेस,पाहुज ,लूनी,म्हुवर,पूर्वी सिंधु,पूर्वी पार्वती ,रेवा,घोड़ा पछाड़ ,अस्न,कलिसिन्ध ,आऊ ,चंद्रभाघा,किलोल,चीलर,छिपरा,गंभीरा,सांसरि,सोमली आदि कई छोटी बड़ी नदी होन को भोत विस्तार से वर्णन करयो हे |एका अलावा भी मालवा का बारा मे घनी ज्ञान की बाता इनी पोथी मे लिखी हे | मालवा साहित्य का बारा मे या आने वाली पीड़ी के घनी उपयोगी साबित होगी |

राजेश भंडारी “बाबू “ १०४ महावीर नगर इंदौर


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