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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



वट सावित्री का व्रत सुहागिनों के
लिएअखंड सुहाग का प्रतीक


विनीता चैल


आदिकाल से हमारे पूर्वज प्रकृति के आराधना करते रहे हैं | सनातन धर्म के साथ हमारे यहाँ मनाए जानेवाले प्रत्येक त्योहार और व्रत को प्रकृति से जोड़ दिया गया है | भारतीय संस्कृति में प्रकृति से जुड़ी प्रत्येक प्राणी को पूजनीय माना गया है | प्रकृति के पूजन से जीवन में सुख एवं समृद्धि का प्रतीक है 'वट पूजन '| सुहागन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जल रहकर 'वट सावित्री ' का व्रत रखती है और वट वृक्ष का पूजन करती हैं | वटवृक्ष सुहागिनों के अखंड सुहाग का प्रतीक है 'वट सावित्री का व्रत ' | वट अर्थात बरगद का वृक्ष इसकी आयु करीब तीन सौ साल मानी जाती है | बरगद के वृक्ष की आयु सबसे लंबी होने के कारण सुहागिने अपने पति की लंबी आयु के लिए वटवृक्ष का पूजन करती हैं | सुहागिनों के अखंड सुहाग का प्रतीक 'वट सावित्री का व्रत ' ज्येष्ठ मास के त्रियोदशी से अमावस्या तक मनाया जाता है | ज्येष्ठ मास के तीव्र चिलचिलाती भीषण गर्मी में सुहागिने बरगद की वृक्ष की घनी छांव तले वटवृक्ष का पूजन कर पति की सलामती एवं लंबी आयु का वरदान मांगती हैं | पौराणिक कथा के अनुसार ज्येष्ठ अमावस के दिन ही पतिव्रता सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लेकर आयी थी | बरगद के वृक्ष के नीचे जो जटाएं होती हैं उन्हें सावित्री के रूप का स्वरूप माना जाता है | सावित्री सुहागन स्त्रियों के लिए एक आदर्श पात्र स्वरूप मानी जाती है | राजकुमारी सावित्री ने एक एेसे राजकुमार से विवाह किया जिसकी आयु मात्र एक वर्ष ही शेष बची थी | मगर सती सावित्री ने सालभर व्रत एवं उपवास कर यमराज से अपने ससुर का खोया हुआ राज पाठ , परिवार की सुख-समृद्धि एवं स्वयं पुत्रवती होने का वरदान माँगा और पति सत्यवान के प्राण मृत्यु की शैया वापस लौटा लायीं | तभी से ज्येष्ठ माह की अमावस्या को वट सावित्री का व्रत का प्रारंभ हुआ | वट वृक्ष पतिव्रता सावित्री के उस आस्था , विश्वास एवं पराक्रम का साक्षी है जब उसने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस मांग लिए थे | ये सावित्री के दृढ़ के निश्चय एवं अटूट विश्वास का ही प्रतिफल था | आज के समय में बरगद का वृक्ष ही सबसे दृढ़ , स्थिर , एवं अटूट माना जाता है | पति के लिए लंबी आयु का वरदान वटवृक्ष से इस कारण माँगा जाता है क्योंकि बरगद के वृक्ष की आयु सबसे अधिक मानी जाती है | 'वट सावित्री का व्रत ' मूल रूप से हमारे भीतर के आस्था और विश्वास का पर्व है जो हमें प्रकृति के साथ एक सूत्र में बांधे रखती है | बरगद की वृक्ष एक एेसा वृक्ष है जिसपर चाहे कोई भी मौसम हो कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता | तीन दिनों तक चलनेवाले इस वट सावित्री के व्रत में सुहागिने निर्जल उपवास कर बरगद के वृक्ष से अपने पति के लिए उनके जैसी लंबी आयु एवं स्थायित्व का वरदान मांगती हैं | हमारे आस्था और विश्वास का यह पर्व हमें प्रकृति के साथ मिलजुल कर चलना सिखाती है |


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