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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



युग-विडम्बना


अशोक दर्द


सावित्री की बेटी पारो के ससुराल से फोन आया ,पारो के लड़का हुआ है |बूढ़ी विधवा माँ बहुत खुश हुई |नानी बनने पर उसे पूरे मोहल्ले के परिचितों से खूब बधाइयाँ मिलीं |फिर कुछ समय बाद पारो का फोन आया ,मम्मी मेरे यहाँ आना तो जरा नाक से आना | पहली बार पारो की शादी के समय डिमांड उसके ससुराल वालों की थी |तब उसने अपने गहने व जमा पूँजी निकल कर पारो की शादी खूब धूमधाम से कर दी थी | अब की बार डिमांड उसकी अपनी बेटी पारो की थी |यद्यपि पारो माँ की परिस्थितियों से अच्छी तरह परिचित थी | माँ ने दोनों बेटों से पारो के फोन की बात कही ,परन्तु दोनों ने अपनी – अपनी तंगी का रोना रोकर हाथ खड़े कर दिए |तब सावित्री ने अपनी बची दो सोने की चूडियाँ बेचकर दोहते के लिए चेन बनवाई और पूरे परिवार के लिए कपड़े खरीदे | फल और मिठाइयां टोकरे में बांध पारो के यहाँ हो आई | पारो के ससुराल में उसके मायके की नाक तो बच गई परन्तु बूढ़ी माँ जब वापिस घर आई तो उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा | चूडियाँ बेचने की बात सुनकर बेटे – बहुएं उससे इस कदर खीझ गये कि कलह क्लेश के बाद उसे दो रोटियां भी देना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा | अब सावित्री मंदिर में सेवा करके अपनी दो रोटियां व बुढ़ापे कि दवाइयों का खर्च चलती है और वहीँ मंदिर की धर्मशाला के एक टूटे –फूटे कमरे में घुट –घुट कर अपना बुढ़ापा ढो रही है | उधर बेटों –बहुओं का कहना है कि माँ जी का रुझान भगवान की ओर हो गया है |वह अब घर के बंधन में बंधकर नहीं रहना चाहती | इसलिए वह सन्यस्त हो गई हैं और अब घर नहीं आतीं ||


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