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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



जागृति


अर्विना गहलोत


जागिरदारी तो किबे की चाल्गी अबार के बच्चा के बुढ्ढा सब इसे नाम से गाँव में जाणे से।

जागीरदार सा सैर कर के लौटे तो हर दिन की तरह जगदीश की माँ सब को उनका काम समझा रही थी, ये उनका रोज रोज का नियम था।

"ओहो थ्हे आग्या ! तम बसो, मैं लाड़ी ने बुलाऊँ | रे लाड़ीसा जगदीश का बापू रे वास्ते पेली चाय, ने बाद मैं खाणो बणाओ जल्दी सी |

"जी माँ सा, जो हुकम |"

"ओहो ! ल्यो जगदीश रे बापू ,चाय पियो थ्हे।"

"लाड़ीसा इसी मसालेदार चाय बणावे मन खुस हो जाय है।"

"इब देखूं लडी़सा के करण लागरे है रसोडे में |"

"ये के कियाे लाड़ी ? दाळ,सब्जी धोया पाछे पाणी क्यो राख राख्या है बाल्टी में ,वठी ने स्नान घर में भी साबुण रा पाणी सूं भरी बाल्टी राख राखी है ! ओहो म्हारी पढ़ी लिखी बिंदणी अब म्हे अनपड़ ने समझाओ तो सही |"

"माँ सा रसोड़े का पाणी तो आंगण में लाग्या पौधा ने दूंगी , रही बात साबुण के पाणी की तो हम व्हाने पखाणे में डाल पखाणे को साफ सुथरा कर लेन में इस्तेमाल कर ल्येसा ,हमारो साफ पाणी भी बच जावेगा न। अब हम सबने भरी दुपहरी में पाणी खतम होन पर तीन मील दूर कूंए तलक दुबारा नहीं जाणा पड़ेगा न।"

"अरे सुण रे ओ जगदीश के बापू ! लाड़ीसा घणी ज्ञान की बातां कर री है | म्हारी तो पाणी ढो ढो के कमर बैठगी | रे थ्हे सब के सब कान फाड़ के सुन ल्यो, अब जो भी पाणी बखेरेगा उने पाँच घड़ा पाणी भरी दोपहरी में भरणा पड ज्यासा | या म्हारो फरमान से, समझ्या थै।"


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