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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



हजम


अमित राज ‘अमित’'


रेणुका ने द्वार पर खड़ी माँगने वाली को खाना देकर दरवाजा बन्द कर लिया, सहसा उसके मुँह से निकल पड़ा- ‘‘ये माँगने वाले भी, सुबह-सवेरे ही..................................... खैर।’’

‘‘माँ आपने खाना किसको दिया?’’ बच्चे ने पूछा।

‘‘बेटा माँगने वाली थी, द्वार पर आ खड़ी हुई, उसे दे दिया।’’

‘‘आपने तो सारी मिठाई भी दे दी, मेरे लिए कुछ रखा ही नहीं।’’ बच्चे ने नाराज होते हुए कहा।

‘‘बेटा वो रात का बासा खाना था, मिठाईयाँ भी खराब हो चली थी, तुम खाते तो उल्टियाँ करते और बीमार पड़ जाते। मैं तुम्हारे लिए ताजा मिठाईयाँ बना दूँगी।’’ रेणुका ने बच्चे को समझाते हुए कहा।

बच्चे ने पूछा- ‘‘माँ ओ माँगने वाली कैसे खायेगी मिठाई, वो बीमार................................?’’

बात काटकर- ‘‘ बेटा वो गरीब ठहरी, इन लोगों को सब हजम होता है, इनके न बीमारी होती है, न कुछ और।’’


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