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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



हेलो जिंदगी


सुशील शर्मा


           
जीवन के उतार-चढ़ाव को ढोती हैं जिंदगी 
कभी हंसती तो कभी रोती है जिंदगी 
आस्था की अनुभूति समेटे है जिंदगी 
संघर्षों से खुद को लपेटे है जिंदगी। 
अभिमानों के कटीले रास्तों में 
स्वाभिमानों को सहेजे है जिंदगी। 
एक रात में आसमान कोई नहीं छूता। 
दिन रात कड़ी मेहनत चाहती जिंदगी। 
जो धूप में खून सुखा चुका है उम्र भर 
उसी के संग दौड़ती लगाती है जिंदगी। 
माँ बाप ने पाला है कितना कष्ट उठा कर 
उनकी सेवा का धर्म निभाती है जिंदगी। 
झुण्ड में चलना फिरना कुत्तों का काम है। 
शेरों के तो पैरों पर  तेल लगाती है जिंदगी। 
हारने पर ये दुनिया मौका नहीं देती 
जीतने पर गले लगाती है जिंदगी। 
कुछ देने से पहले कुछ लेती है इस तरह 
बराबर का हिसाब बताती है जिंदगी 
कभी रूकती नहीं कभी थकती नहीं ये 
नदी की धार के मानिंद बहती है जिंदगी
                     

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