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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



फुरसत नही मुझे


सुशील शर्मा


           
फुरसत नही है अब
करना देश निर्माण है।
हरपल देश विकास में
देना मुझे प्रमाण हैं।

सबसे पहले परिवर्तन
खुद में मुझको लाना है
कर्तव्यों के निर्वाहन का
खुद को पाठ पढ़ाना है।

मेरे शहर की सूखी नदिया
मुझ को आज बुलाती है।
कटे हुए सूखे जंगल में
अब गौरैया न गाती है।

फुरसत नहीं है एक पल की
मुझको अब विश्राम कहाँ।
अपने शहर के विकास का
मुझको करना काम यहां।

हर झोपड़ पट्टी के आंगन में
शिक्षा का दीप जलाना है।
दलित और शोषित जन को
उनके अधिकार दिलाना है।

हर नौजवान को काम मिले
हर नारी यहां सुरक्षित हो।
जीवन की हर  सुख सुविधा
वृद्धों को आरक्षित हों।

भारत विश्वगुरु बन जाये
तब मैं आराम करूँगा।
हर जन को रोटी मिल जाये
तब में विश्राम करूँगा।

तब तक रुकना नही है मुझको
मीलों रास्ता तय करना है।
भारत के नव निर्माण में मुझको
अपना रोल अदा करना है।



                     

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