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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



आदमी


संदीप कुमार मिश्रा


           
उसकी बनाई नियामत है पर

आज बदला बदला सा हैं आदमी

सिफत का खजाना हैं, 

क्यूं सिफलगी दिखाता हैं आदमी।

सूरत-ए-हाल सुधरा नहीं

मुस्तकबिल की सोचता है आदमी

एक दूजे का बना दुश्मन,जंगल नहीं

समाज मे रहता है आदमी ।

खुद तो चटोरा है पर ,

दूसरे की रोटी पर लात है आदमी

सत्य असत्य की सहिजानी नहीं ,

न्याय का ढोंग है आदमी ।

शाइस्ता,शकर जबान है फिर

सगर से भरी बात है आदमी ।

अपनों से घिरा है लेकिन

परायों के सहारे चलता है आदमी।

ता उम्र संचता,फिर भी ,

रहा हरदम सवाली है आदमी ।

खुद परेशानी का सबब बन

“पर “सबील ढूंढता है आदमी।

जग जीतने का दम भरा लेकिन

खुद से हरदम हारा है आदमी

“और” की चाह में खोकर सब,

शाकिर बन बैठा है आदमी ।

पूरी जिन्दगी लग गई इसे पर

मुहासिल इसका शून्य हैं आदमी ।
                     

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