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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



इबादती सिक्के


रश्मि सुमन


           
ये सच है कि
जब गुम हो जाती कोई चीज
तो होती है बेहद तकलीफ,
लेकिन फिर हमें
आदत सी हो जाती है खोते रहने की
उस अजीज के बगैर रहने की....
जैसे पलकों पर 
कोई पुरानी पीर टिकी हो
और आँखों को मलते ही नई टीस फिर उभर आती हो
जैसे पतझड की पाती(पत्ता)
आशाओं की पाती सी (पत्र)
 आज विलग हुई डाली से
 कल, नई कोपलें फूटेगीं
  उन डाली पर,जिन पर थे हम,
आज की पाती (पत्ता) सी
जैसे इबादती सिक्के को
जब हम फेंकते हैं पानी में
तो पहले गुम हो जाते हैं सिक्के
और बाद में विलीन हो जाती
हमारी अनकही दुआ भी
फिर हम नये सिक्के को चूम कर
मन्नतें दुबारा माँगते पानी मे फेंक कर गुम होने के लिये....
 

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