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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



तुम्हारी यादें!


रश्मि सिंह


           
प्रेम  में जी रही हूँ
नहीं-नहीं उसे बस
महसूस रही हूँ

जब तुम्हारी यादों का 
पहरा हटेगा 
तब क्या मेरा जीना 
सच में जीना होगा

नहीं-नहीं बिल्कुल नहीं 
इस कल्पना मात्र से ही तो
मेरे जिस्म की पूरी रुह
काँप उठती है

और फिर से 
तुम्हारी सारी यादें
तुम्हारे सारे स्पर्श
तितलियों सी पंख पसारे
मुझे समेट लेने को
चली आती है

मैं एक बार फिर से
तुम्हारी यादों की गिरफ्त में पहुँच 
खुद पे इतराती हुई सिमट जाती हूँ
उन पंखों के कैद में 

जहाँ बस हम जिया करते है!
 

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