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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



पिता अपनी संतानों से


पीताम्बर दास सराफ "रंक"


     
मेरे लिये तुम कुछ मत करना
कुछ भी करना तो इनके लिये(नाती पोते)
मेरा क्या है,रहूं ना रहूं
ये तो रहेगें कल के लिये।।1।।

मेरी देखो ये उम्र पकी है
गिनती के चंद दिन ही बचे हैं
ये जो जन्में हैं अभीअभी
ये तो उम्र में कच्चे घड़े हैं
मेरे लिये चिंतित मत होना
कष्ट उठाना तो इनके लिये।।2।।

देखो इन मासूमों को जो
नहीं जानते आज और कल
जीवन क्या है,मृत्यु क्या है
क्या होता है समय का चक्र
मेरे लिये कर्तव्य को छोड़ो
कर्तव्य निभाओ तो इनके लिये।।3।।

कल जो होने वाला है वो तो
नहीं लिखा है किसी भाल पर
किसका होगा कल ये कैसा
कह नहीं सका कोई आज तक
तुम बस इतना ही करना
जीना सरल हो इनके लिये।।4।।

ये तो कुल के रखवाले हैं
आज से बेहतर करने वाले
इनके हाथों में है परिवर्तन
ये नहीं किसी से डरने वाले
मेरे लिये आकाश न भरना
तारे तोड़ना तो इनके लिये।।5।।

इनका सुंदर कल हो एैसी
निर्मित करना सोच कोई तुम
इनमें जीने की हो अभिलाषा
एैसी देना टेर कोई तुम
पुलकित हो निकले इनका सूरज
अलख जगाना तो इनके लिये।।6।।

जो भी करना अच्छा ही करना
बुरा किसी का करना मत
राह में ग़र आयें रोड़े तो
उल्टी राहों पे चलना मत
मेरी संभाल जरूरी नहीं है
नेकी करना तो इनके लिये।।7।।

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