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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



आज निश्शब्द हूँ मैं


नीतू शर्मा


  
आज निश्शब्द हूँ मैं
मासूम बच्चियों की चीखती,
चिल्लाती अपना हक माँगती गूँजों से
कहीं गड्ढों में कहीं नालियों में,
कहीं कचरों में कहीं झाड़ियों में
मासूमों को रोते बिलखते देख
आज निश्शब्द हूँ मैं |
कहाँ से लाऊं वो शब्द
जो लोगों के भूसे-भरे 
दिमाग को समझा सके,
बदल सके घृणित मानसिकता को 
भेड़ियों सी नजरे गडाएं
न जाने कब किसे अपना
शिकार बना ले
इन इंसानी जानवरों को देख,
आज निश्शब्द हूँ मैं |
मेरे पास वो शब्द नहीं,
जो रोक सके हैवानों को
हैवानियत करने से
तेजाब से झुलसी 
असहनीय पीड़ा सहती
न्याय की गुहार लगाती
पीड़ित लड़कियों को देख
आज निश्शब्द हूँ मैं |
जैसे चीकने घड़े पर
पानी नहीं ठहरता है
वैसे ही बड़े-बड़े अभियानों से
भाषणों से कानूनों से 
कोई असर नहीं पड़ता है
सरे आम अपराध होते देख
औरतों को सम्मान खोते देख
आज निश्शब्द हूँ मैं |
आज निश्शब्द हूँ मैं ||  

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