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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



अब क्यों नहीं .......?


डॉ नवीन दवे मनावत


  
अब क्यों नहीं आती 
वो बहार?
सुख की ........
दुख का अनुभव कराने के लिए
अब क्यों नहीं
दिखती परछाई ?
मेरे शुभाशुभ कर्मों की 
जहां में सजग हो जाउ!!
अब क्यों नहीं सुनाई देती 
वो मां की फटकार?
मेरे विचलित होने पर
जहा में पथभ्रष्ट हो जाउ.....
सभी समय की 
मार से स्वयं 
आधात विचलित है?
समय से असंतोषित है
मृगतृष्णा की ओर.........

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