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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



टुकड़ों मे बिखर जाऊँगा मैं....


नरेश गुर्जर


  
उखड़ी उखड़ी सी रहती है आजकल सासें मेरी,

कोई गुबार है जो सीने से बाहर निकलना चाहता है...

शायद इसीलिए वो मुझे तकलीफ देता है,

छुकर देखा था जब अपनी नब्ज को मैने तो मालुम हुआ...

ये चलती है एेसे जैसे कोई बेकाबू रेलगाड़ी फाटक तोड़ती हुई निकल जाती है,

और ये जिस्म भी किसी भाप के ईंजन की तरह तपता रहता है 

जब ये तपीस अपनी चरम पर होगी तो ये इंजन फट जाएगा 

टुकड़ों मे बिखर जाऊँगा मैं....


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