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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



देख रहा हूं


नरेंद्र श्रीवास्तव


  
बचपन में
पिताजी
उंगली पकड़े ले गए हैं
बाज़ार
कभी मेला
कभी सिनेमा
कभी सरकस
फिर
पिताजी के
गुजर जाने पर
माँ की 
साड़ी पकड़कर
पीछे-पीछे चला हूं मैं
रसोई घर,पूजन स्थल
घर के इस छोर से उस छोर तक
और अब
जब माँ भी गुजर गई
तब देख रहा हूं मैं
आकाश,आँगन,पेड़-पौधे,पशु-पक्षी
और लोग
ये दुनिया।

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