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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



आदमियत के साथ


डॉ.मनोहर अभय


  
तुम्हें 
इतना नहीं गिरने दूँगा 
कि आधुनिकता के पोषक 
तुम्हें  किसी सामंती गाँव के घूरे पर
रद्दी कागज़ या जूठी पत्तल की तरह फेंक दें 
वैसे वे तुम्हें 
गर्दन तक कीचड़ में धकेल चुके हैं
हर आता- जाता आदमी 
ठोकर मार कर  धकेले  जा रहा है
-- नीचे और नीच धँसने के लिए 

मैं तुम्हें ऊपर खींच कर ही दम लूँगा
चाहे मेरा दम निकल जाए 
कि कपडे बदल कर 
उस कतार में शामिल हो सको
जिस में  अभिजात्य  खड़े हैं
-सत्यव्रती अभिजात्य|

वैसे कोई नई पोशाक नहीं दे सकता
 इतना कर सकता हूँ 
कि अपनी पोशाक खुद बना सको 
वर्जित गलिओं में प्रवेश करने के लिए 
आदमियत के साथ|

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