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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



बदलती कविता


कृष्ण कुमार यादव


 
बदल रही है आज की कविता
वह सिर्फ सौंदर्य नहीं गढ़ती
बल्कि समेटती है अपने में
सामाजिक सरोकारों को भी
 
सदियों के अवसान के साथ
सभ्यताओं के दरकते किनारे
भूमण्डलीकरण और साम्राज्यवाद
की आड़ में पनपता नव-उपनिवेशवाद
सचेत करती है कविता इसके भी प्रति
 
समाजवाद और मार्क्सवाद
की धारणाओं के बीच
लोकतंत्र के धरातल पर हो खड़ी
दिखाती है कविता उनका भी चेहरा
जो वाद का मुखौटा लगाकर
करते हैं नीतियों का प्रतिवाद
पर बचाये रखते हैं अपनी कुर्सियां
 
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बढ़ती
मॉल नीतियों की आड़ में
शरीर भी बन जाता है माल
स्त्री विमर्श और देह विमर्श के
झीने आवरण में से झांकती
कविता दिखाती है एक और चेहरा
 
अमेरिकी दादागिरी के आतंक पर
नष्ट होती मैसोपोटामियाई सभ्यता
और तालिबानी संस्कृति के नाम पर
नष्ट होती अहिंसावादी बुद्ध की प्रतिमा
दोनों की साम्यता को दर्शाती है कविता
 
भाषा, शिल्प और कथ्य के बहाने
यथार्थ छुपाकर रखती है
संस्कृतियों के दरकने का
इतिहास के करवटें बदलने का
कविता चौकन्ना  करती है
आगामी पीढि़यों को।

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