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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



विदेश में बर्फ व् औरत में रिश्ता करीब


कविता गुप्ता


पत्थर सी जमीं बर्फ का, बूँद बूँद बहता पानी, 
छत से टपकने का एहसास, कह रहा कहानी। 
यह उसका ख़्वाब था या स्वाभाविक प्रक्रिया ?
ठण्डक भूले लोग, क्योंकि 'जमना' रीत पुरानी। 

सूर्य की तपिश जिद्दी, मेरे धैर्य का लेगी इम्तहां ,
फिर ढूँढोगे तुम इधर उधर मेरी कोई निशानी। 
वाष्प का रूप ले मेघ बन कर लौट आना मुझे ,
वहाँ भी चैन नहीं, धरती माँ की गोद ही सुहानी। 

नदी नालों बाज़ारों में घूमती सिंधु में जा मिलूँगी, 
नीर, पानी, वारि नाम, मेरी पिघली हुई जवानी।
रुकना मुझे गवारा नहीं, जन्म मेरा होता रहेगा ,
सुने, चाहे न सुने, किंतु मैंने अपनी कथा सुनानी। 
 

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