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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



तलाश


हरदीप सबरवाल


मेरा मन, बच्चे की तरह, 
तलाश रहा है, अलादीन के चिराग को, 
और इस ख़ोज में, 
मैंने खो दिया है,जिंदगी का रोशन हिस्सा, 
और हासिल किया ये अंधेरा, 
कामधेनू को पाने की इच्छा, 
अभी जीवित है मन में कहीं, 
और इस कामना ने दूर किया मुझे 
मेरे अपनो से 
और एक मुजरिम की तरह, 
खड़ा हुं सवालो के कटघरे में, 
बावजूद इसके मन की रह गई है मन में, 
कल्पवृक्ष की ठंडी छांव में 
बैठना चाहता है मेरा ये तन, 
और इस चाहत की खातिर, 
रिश्तो के रेगिस्तान की मृगतृष्णा में भटकते हुऐ, 
मैंने झुलसा लिया है, अपना बदन, 
चिंतामणी रत्न को पाने की कोशिश में, 
मेरी मेहनतो और मेरी हसरतो नें, 
क्या पाया है? कुछ भी नहीं, 
जब्कि हर एक रिश्ते और दोस्ती के रत्न, 
मैंने गवां दिऐ है, धीरे धीरे.
 

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