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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



दावानल


हरदीप सबरवाल


दावानल, अनायास ही, 
सिर्फ जंगलों में ही नहीं, 
विचारो में भी उफनते हैं, 
धधकते अंगारो से, 
पूछते भी हैं, 
और जवाब का इंतजार भी नहीं करते, 
सवालो की बची राख को, 
बिखेर देते हैं,स्याह में, 
शायद कहना चाहते हो, 
कोरी वैचारिकता भी, 
अग्यानता सी ही निष्फल है, 
निष्ठुरता से , 
सभी बुध्दिजीवियों पर , 
उंगलीं उठाकर,बुदबुदा देते हैं, 
सिर्फ विचार ही नहीं, 
इन विचारों को आकार भी दे. 
 

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