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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



सफलता


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा "द्रोण"


 
"सफलता"  तू  कहाँ   मिलती है
जाने मैने तुझे कहाँ नही ढूंढा  है
क्या   तेरा   कहाँ  
स्थान और पता क्या   है
क्यों   बन   बैठी  है   तू 
अन्जानी न है तेरी 
कही पग की निशानी
आखिर   क्या   है   तेरा मार्ग 
रहा कहाँ ठिकाना है।
कहाँ   कहाँ     ढूंढा   तुझको 
ओर छोर नही छोड़ा है
पर   तू  न   कहीं  मिली  मुझको 
तेरा कहाँ बना घरौंदा है
ढूंढा   ऊँचे   विश्वविद्यालयों  में 
और सभी पाठशालाओं में
बड़े बड़े महाविद्यालय और 
शैक्षिक संस्थानों   में
स्वादिष्ट   मीठे तीखे फलों 
और सभी पकवानों   में
चोटी   के   शिक्षा   संकायों  में 
ऋषि मुनियों की शालाओं में
वो   भी   तुझको   है  ढूंढ   रही 
गुरुकुल के एकांत स्थानों में
बल्कि   मुझको   ही   पूछ    रही 
एकांत मन चित्त तन में
क्या   तुमको   कुछ   पता भी   है 
वो एकाग्र मन में निवास करती है
ये  सफलता आखिर  कहाँ  रहती है 
मन बुद्धि में पलती है
मेरे   पास   तो   
"असफलता"  का   पता  था 
छा रहा अन्धकार था
जो   हर रोज   अक्सर राह में 
मिलता  निर्जन सुनसान था
परेशान   रहकर 
खूब   की भागदौड़ जीवन में
पर   ये   कोशिश   भी   
कोई काम न   आई इस युग में।
उम्र   अब   ढलान    पे  आई 
हरजाई चितलाई
हौसला भी  अब यह थकान   
न झेल सका 
न रही आना पाई
हाँ  किस्मत की  तस्वीर   
है   मेरे   पास आई
अब   भी   बची   है 
आस मेरे मन में भाई
मैं   भी   हार    नही    मानूंगा  
संघर्ष  करूँगा में भाई
सफलता   के   रहस्य   को    
जानूंगा और खोजूंगा नम मन से
बचपन    में    मिला    करता    था 
किताबों में चैन
मेरे    साथ   रहा  करती   थी 
किस्मत और कर्माई
पर   जबसे    मैं    
बड़ा   हो    गया हूँ भाई
मेरी  सफलता   मुझसे   
जुदा   हो  गयी यहाँ सौदाई
मैं   फिर   भी   नही   हुआ    
हताश आज तक
जारी   रखी    उसकी    
तलाश दर ब दर जाकर
एक   दिन   जब  उसने मुझे 
आवाज   ये  लगाई
क्या    मुझको    ढूंढ   रहे हो 
"द्रोण"  है   भाई
मैं  तो तेरे   अन्दर मस्तिष्क में  
छुपी  हुई    हूँ भाई
तेरे   ही   घर   में   बसी   हुई हूँ 
खोज निकालो चितलाई
मेरा  नहीं  है   कुछ   भी    
"मोल" यहाँ
सिक्कों   में   मुझको   
न  तू तोल यहाँ
मैं  तो कर्मो   के 
कठिन परिश्रम   में    हूँ
तेरी सोच के  साथ  
खानपान हर  में हूँ
तेरे  " कर्म "  के  संग   
जीने   में 
न कि भाग्य भरोसे में हूँ
ईश और माँ ,  बाप , गुरु के   
आशीर्वाद   में हूँ
सादा जीवन , उच्च विचारों 
और किताबों में हूँ
बच्चों  के स्वस्थ्य , 
सत्यता के लब्जों  में   हूँ
माँ    की   निश्छल  ममता , 
स्नेह ,प्यार , सेवा , सत्कार में  हूँ
हर   पल   तेरे   संग 
पल पल विचरण करती  हूँ
और   अक्सर   तुझसे 
सद्कर्म के लिए कहती   हूँ
मैं   तो   हूँ   बस   एक    
"कर्म ही पूजा है" का आधार
बंद कर  दे  
अब तू  अपने भाग्य 
और नियति की तलाश
जो   मिली  उसी   में   कर   
"संतोष" और आगे कर प्रयास
आज  हासिल कर  
कल  की न सोचकर हो तू हताश
कल  के   लिए   आज   को  
न   खो न कर निराश
सफलता  लिए   कभी   
दुखी    न   हो न हो निराश
कभी कर्म के लिए   
तू कभी   दुखी   न    होना  
तू कर प्रयास
कर्म से  ही सफलता 
तेरे कदम चूमेगी ये रख विस्वास
खुद ईश चलकर आएगा 
क्या चाहता है पूछने तेरे पास
सफलता घूमेगी तेरे
चहु ओर पास
तब जीवन में तेरे आएगी मिठास।
 

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