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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



मेरी गौरैया


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा "द्रोण"


 
मुझे याद है अपना
बीता बचपन  
जीवन के अल्हड़पन
के वो दिन, जब 
गाय के घर में लगे 
लकड़ी के बीम के ऊपर 
तिनका चुन चुन कर
गौरैया अपना घोंसला बनाती थी 
और उसमें अंडे देती थी 
जिसमें से कुछ दिन बाद 
बच्चे निकलते थे मुझे याद है, 
मैं बहुत देर-देर तक घोंसले 
और गौरैया के बच्चों को 
यूँ ही निहारता रहता था। 
एकटक मौन स्तब्ध सा
वैसे मैं आपको बता दूं कि 
बचपन में मैं प्रकृति के प्रति 
बहुत ज़्यादा संवेदनशील था
मेरे घर में उस वक़्त गुल्मोहौर 
अंजीर , अशोक और अमरुद 
के पेड़ साथ ही अनार, पपीता 
फूलों के पौधे और अन्य पेड़ भी लगे थे 
जिनमें नीम्बू,फुलवारी 
की बेल भी लगी थी।
और सब्जियों की बेल भी
यही नहीं मेरे घर के में एलोवेरा भी था 
और गमले भी जिसमें 
तरह के फूल लगते थे 
बगीचे में भी तरह तरह की चिड़ियों ने 
अपना घोंसला बनाया हुआ था 
जिनमें गौरैया और बुलबुल 
मुख्य रूप से थीं 
जिनका स्मरण मुझे अभी तक है। 
मगर अफ़सोस कि अब 
शहर में ही लम्बे समय से 
ज़्यादातर रहने के कारण 
वहां पर किसी भी प्रकार की 
कोई देखभाल भी नहीं हो पा रही है।
मुझे एक बात का स्मरण और भी है 
आज से क़रीब दस वर्ष पूर्व 
एक रिश्तेदार ने मुझसे पूछा 
कि 'विजय' क्या तुम्हे मालूम है 
कि आने वाले वक्त में 
गौरैया गुम हो जायेंगी 
और उनका नामों-निशाँ तक 
नहीं बचेगा?' मन खिन्न
मैंने पूछा- 'वो कैसे?' 
उन्होंने कहा कि 'ये जो मोबाइल है 
इनके विनाश का मुख्य कारण बनेगा!' 
तभी से मुझे यह ज्ञात हुआ 
कि ये संचार क्रांति ही 
गौरैया के विनाश का ही 
मुख्य कारण बन रही है। 
बिजली के तार, 
माइक्रोवेव,  अंतर्जाल
मोबाइल टावर की वजह से 
गौरैया खत्म होती जा रही हैं। 
यह तो एक कारण है ही 
और मैं इससे भी 
बड़ा कारण मानता हूँ कि 
इस भौतिकवाद ने हमें 
पत्थर दिल बना दिया है !
आप अपने आप से पूछिये 
कि क्या आप इन चिड़ियों 
गोरैया आदि पक्षियों को देख कर 
बचपन में खुश न होते थे? 
क्या आपको ऐसा कुछ 
करने का मन नहीं होता था, 
आप उनके लिए भी 
कुछ न कुछ करें जिससे 
वे हमेशा या ज़्यादातर 
आपकी आँखों के सामने रहें? 
सुबह को क्या आपको 
चिड़ियों की चहचहाट 
सुहानी नहीं लगती है? 
क्या सांझ ढले इनके 
घोंसलों की वापसी की 
बेला में इनका सुहाना शोर 
एक संगीतात्मकता सा 
अनुभव नही कराता है? 
आखिर हम इतने 
कठोर कैसे हो गए? 
हम प्रकृति के प्रति इतने 
आज उदासीन क्यूँ हो रहें है? 
इन सब सवालों में ही 
इन पक्षियों के बेहतरी का 
इन्हे बचाने का 
इन्हे पालने का 
इनके भोजन का
हमारे ही अंदर भविष्य छुपा है!
आओ सब मिलकर आज 
एक सङ्कल्प ले 
इनके लिए दाना और पानी
नित्य रखेँ ताकि
इनका जीवन संरक्षित
और सुरक्षित रहे।
 

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