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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



आज की कविता


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा "द्रोण"


 
कहे तो आज है 
कविता कहने का दिन
कवियों को याद करने का दिन 
कवि की रचनाओं का 
सम्मान करने का दिन 
कविता दिवस मनाने का दिन
संवेदनाओं से कविताओं ने
हमारी मानवता को दिशा देने में 
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई  
वाचिक परंपरा में इसने 
सामाजिक मूल्यों को सहेजा  
इसलिए कविता रचने वाले 
कवि और कवि की रचनाओं को 
सम्मान दिया ही जाना चाहिए 
कविता कहने
मनाने का एक और कारण बताया 
कि यह दिन भाषाओं के 
सम्मान के लिए याद 
किया जाना चाहिए 
पहले कविता अद्भत थी
बचपन में हम गीत को
कविता के रूप में
रट-रटकर कई कविताएं 
याद किया करते थे 
उसमे एक लय थी 
एक ताल थी वह कविताएं 
छंद में होती थीं, 
इसलिए जुबान पर चिपक जाती थीं 
छंद याद रखने में आसान होते थे
इसलिए कविताओं को भी 
याद रखना आसान होता था 
लेकिन नई कविता के प्रचलन के बाद 
कविताएं छंद मुक्त होने लगीं 
क्योंकि नई कविता सीधे तौर पर 
आम जन-जीवन से जुड़ी होती हैं, 
इसलिए स्मरण नहीं रहते हुए भी 
यह ज्यादा गंभीर होती हैं 
छंदमुक्त कविता आज की कविता है
यह वर्तमान को बताती हैं 
और हमें भविष्य की ओर ले जाती है
नई कविता ने आम लोगों का 
समय और समाज के साथ 
साक्षात्कार कराया संवेदनशील 
मुद्दों पर चर्चाएं कराईं
दरअसल क्या है कि कवि का 
संवेदनशील होना बहुत जरूरी है
संवेदनशील कवि ही समाज के यथार्थ 
को शब्दों में पिरो सकता है 
जिससे संवेदनशीलता से ही 
कविता बनती है
इस संवेदनशीलता को समझकर ही 
हम मुक्तिबोध की कविताओं को 
समझ सकते हैं आत्मसात करते है
मुक्तिबोध ने अपने समय में 
मनुष्य की पीड़ाओं को 
यथार्थ से रूबरू कराया जिसे
अपनी कविताओं में स्थान दिया
उनकी कविताओं में समाज 
और समय को लेकर गहरी चिंताएं थीं
उनकी कविताएं मनुष्य की बात करती है 
उनकी संवेदना से भरी 
कविताओं ने भविष्य की कविता की 
रूपरेखा तय करती जिससे 
भविष्य के कवियों को 
इससे लाभ मिला
ऐसी कविताएँ पहले भी 
हुआ करती थी और आज भी
बदला है तो बस समय
और आज के तकनीकी लोग
ये भी न जरूरी है 
पता है सब कुछ नियति
पर ही निर्भर है 
इन्सान तो बस कठपुतली है।
 

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