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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



नारी जीवन बन जाती है


बृजेश पाण्डेय ‘बृजकिशोर’


 
राजा-रानी कहानियों से गुज़र गए,
गुड्डे-गुड़ियों के संग भी छूट गए।
पति के संग में बनी संगिनी लेकर अग्नि के फेरे,
सास-ससुर की सेवा करती शायं और सवेरे,
पति-सेवा का व्रत लेकर गुड़िया पतिव्रता बन जाती है।
नारी में जब ममता जागी, तब जीवन बन जाती है।।1।।
बेटी बंदिश में बंध आयी,
होंठों पर अंकुश धर आयी।
रोज रोज की किच-किच सास ननद की सुनके,
दो दो हाथ करने पल्लू में हिम्मत भरके।
मुंह के ताले खोलने को कमसिन मजबूत बन जाती है।
नारी में जब ममता जागी, तब जीवन बन जाती है।।2।।
मां की ममता को पहचानी,
रूप गंवाने की निज ठानी।
गर्भ में अपनी आत्मा से खुशियां वह बिखराती है,
असहनीय पीड़ा को सहकर नया फूल खिलाती है।
फूल में सुरभि भरकर के खुद सुरभिहीन बन जाती है।
नारी में जब ममता जागी, तब जीवन बन जाती है।।3।।
निज वक्ष उघार दिया,
शिशु-मुंह में थमा दिया।
पोषण करने शिशु का पयस्विनी बनी है,
जीवन में गति भरने स्थिर बनी खड़ी है।
रक्षार्थ अपने नव जीवन के सिंहनी बन जाती है।
नारी में जब ममता जागी, तब जीवन बन जाती है।।4।।
महिमा तुम्हारी कौन गा सका,
समता तुमसे कौन कर सका।
बृजकिशोर तुमसा नहीं कोई दयाधर्म करती है,
सम विषम परिस्थितियों में भी जी लिया करती है।
स्व सुख त्यजकर कुटुम्ब को परम सुख दे जाती है।
नारी में जब ममता जागी, तब जीवन बन जाती है।।5।।
वैदिक विदुषी पुनः बनी वह,
स्वाधिकार का बोध लिया।
घर के अल्प जगत से लेकर अम्बर तक सैर किया,
गृहिणी से आगे बढ़ कर ऊँचे पद को पातीं हैं।
अपने कोमल कन्धे पर कितना बोझ उठाती हैं।
नारी में जब ममता जागी, तब जीवन बन जाती है।।6।।
 

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