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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



मैं पीड़ा हूँ


अशोक दर्द


       
मैं पीड़ा हूँ उस खेत की
जो कभी बाढ़ में बह जाता है ,कभी सूखे में झुलस जाता है ,
और कभी –कभी भरपूर फसल के बावजूद भी ,उस पर रोटियां बीजने वाला ,
कर्ज में डूबा ,भूखा ही लंबी नींद सो जाता है ;
मैं पीड़ा हूँ उन हाथों की ,
जो हमेशा छालों से भरे रहते हैं ,जिनकी पीढ़ियाँ मेहनत-मेहनत
लिखते-लिखते खप जाती हैं ;और हासिल-हासिल किसी और के हिस्से दर्ज हो जाता है ,
और वे हाथ रिसते छालों को चीथड़ों में ढककर उम्र गुजार देते हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उस एकता की देवी की ,जो छटपटा-कराह-कुम्लाह
रही है ;जिसे कुछ स्वार्थी दानव फलता-फूलता नहीं देखना
चाहते ,इसलिए उसे काटने के लिए उन्होंने,
उस की जड़ों में ,धर्म-जाति-वर्ण-भाषा-क्षेत्रवाद के जहरीले चूहे
छोड़ दिए हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उन सिसकियों की ,
जो बिस्तर पर मुहं में तकिया डाल,कमरे के अन्दर
ही घुट-घुट कर मर जाती हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उन पंखों की ,जिन्हें उड़ान से पहले ही
काट दिया जाता है ,और जिनके हिस्से का आकाश ,
छीन लिया जाता है ,कभी मर्यादाओं का वास्ता देकर
कभी फ़र्जों का वास्ता देकर ;
मैं पीड़ा हूँ उस सूरज की ,जो चमकना तो चाहता है ,
परन्तु ...,उस के आस-पास फैले भ्रष्टाचार के बादल
उसकी धूप की चमक को धरती को छूने नहीं देते ,
मैं पीड़ा हूँ उन अनाम चीखों की ,जिन्हें किसी नाम से
संबोधित नहीं किया जा सकता ,और
भेड़ियों भरे जंगल में जिन्हें सुनकर ,
हमेशा अनसुना कर दिया जाता है ,
और यदि कोई सुन भी ले तो ,उन चीखों पर रोया नहीं जाता ,
उन्हें चुप नहीं कराया जाता ,सिर्फ
ठहाके लगाये जाते हैं और तालियाँ पीटी जाती हैं ,
मैं पीड़ा हूँ ...,बेबस पीड़ा		 
 

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