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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



बड़ा होने के लिए ....


अशोक दर्द


       
ऊँची-ऊँची चार दीवारों से घिरी ,
भव्य गगन-चुम्बी अट्टालिकाओं का क्या लाभ ?
जहां ,संवेदनाओं
के कोमल महकते फूलों के लिए ,
जगह ही न हो ;
सोने-चांदी से सुसज्जित उस सुन्दर डियोडी का
क्या प्रयोजन
जिसके दर से
कोई दरवेश बिना दुआएं दिए
खाली झोली लिए मुड जाये ,
अम्बर छूती गुम्बदों के नीचे
भरे गोदामों का क्या फायदा ?
जिनकी मुंडेर पर बैठी चिड़िया भूखी ही उड़ जाये ;
और मुट्ठी भर दाने फैंकने के लिए ,
जिनके वाशिंदों के  हाथ कांपने लगें ;
ऐसी गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से तो
वह कुटिया ही महती होती है ,
जहाँ संवेदनाओं के कोमल फूल कुम्लाहते नहीं
दरवेश बिना दुआएं दिए खाली नहीं मुड़ते;
और चिड़िया मुंडेर पर भूखी नहीं फुदकती ,
सच तो यह है मेरे मित्र ,
घर बड़ा होने से कोई बड़ा नहीं होता
दिल बड़ा होना चाहिए.....||
 

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