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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



कशमकश


अनिल खन्ना


 
एक शहर ,
शहर मे 
कालोनी ,
कालोनी मे 
अपार्टमेंट, 
अपार्टमेंट मे 
कमरा, 
कमरे मे 
मैं 
रोज़ रात को 
थक कर 
बिस्तर पे लेटता हूँ ,
बिना पलक झपके
छत को 
टकटकी लगा के देखता हूँ ,
कि शायद 
इस कलयुग मे भी 
कोई दिव्य शक्ति 
आसमान से उतर आए 
और 
अपने चरण स्पर्श से 
मुझे भी 
इस ज़िंदगी की कशमकश से 
श्राप मुक्त कर के 
वापिस लौट जाए ।
परंतु 
ऐसा कुछ नही होता 
कुछ नही बदलता ।

खिड़की से आते 
पेड़ों के साए 
दिवारों पर झूमते हुए 
मेरा उपहास करते 
दिखते हैँ ।
मकड़ी के जालों 
की तरह 
ज़िंदगी के फलसफे 
कोनो मे लटके 
नज़र आते हैं ।
पतंगे की तरह 
उनमे फँसा 
महसूस करता हूँ 
छटपटाता हूँ 
पर निकल नही पाता 
उलझता ही 
चला जाता हूँ ।

साइड टेबल पर रखी 
घड़ी की टिक-टिक 
गुज़रते हुए वक्त की 
याद दिलाती 
नही थकती है ।
" गया वक्त दोबारा नही आता "
पिताश्री की बात अब 
समझ मे आती है ।

आखिर हार के 
करवट बदल लेता हूँ ।
रात के सन्नाटे को 
सुनते हुए 
धीरे-धीरे आँखे 
मूंद लेता हूँ ।
इक नई सुबह के 
इन्तज़ार मे ।		 
 

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