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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



जाड़ों की धूप


अनिल खन्ना


 
खिड़की के पर्दे 
मत गिराओ ,
उठे रहने दो ।
शीशों से छन कर 
गुनगुनी धूप 
अंदर आती है ।
दिवार से सटे 
सोफे पर 
प्यार से बिछ जाती है ।
धूप की चादर ओड़ कर
जब भी 
सोफे पर लेटता हूँ , 
अपना बचपन याद करता हूँ ।

घर के बरामदे मे 
एक बड़ा तखतपोश होता था,
नीचे गद्दा और उपर पीली 
चादर से ढका रहता था ।
जाड़े की धूप सारा दिन 
बरामदे मे डेरा जमाती धी ।
हर इतवार तखतपोश पे 
मजलिस लग जाती थी ।

एक तरफ पापा जी 
चोंकड़ी मार के 
बैठ जाते थे ।
ढेर सारा साबुन 
मुह पे लगा के 
हजामत बनाते थे ।
दूसरी ओर मै 
सरसो के तेल की 
मालिश कर के 
दंड बैठक लगाता था ।
न चाहते हुए भी 
" कांगड़ी पहलवान " के 
खिताब से सम्मानित होता था ।

बहने सर नहा के 
धूप मे बाल सुखाती थीं ।
खाने की तैयारी मै 
बीजी का हाथ बटाती थीं ।

दोपहर का खाना 
तखतपोश पर ही 
सज जाता था ।
घी -शक्कर के साथ 
मकई की रोटी और 
सरसों का साग खाने मे 
कितना मज़ा आता था ।

खाने के बाद 
रेवड़ी और गच्चक से 
मुह मीठा होता था ।
धीरे-धीरे 
खाने और धूप का नशा 
सिर पर चड़नै लगता था ।

पापा जी और बीजी 
तखतपोश पर ही 
पसर जाते थे ।
अखबार पड़ते - पड़ते 
सो जाते थे ।
मोका देख कर 
हम भी अपने रसाले 
निकाल लेते थे ।
चंदामामा और पराग के 
पन्नो मे 
खो जाते थे ।

आहिस्ता - आहिस्ता 
हवा मे एक खुमारी सी 
छाने लगती थी ।
हमे अपने आगोश मे लेकर 
जाड़ों की धूप भी थोड़ा 
सुस्ताने लगती थी ।
 

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