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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



हाइकु


अशोक बाबू माहौर


 (1) 
      
साँवली रात 
सन्नाटा पसरा है 
पेड़ सो रहे।

 (2) 

चाँद अकेला 
बादल घनघोर 
लोग मगन।

 (3) 

धूप जलाती 
गर्मी खूब पसरी 
पसीना बहे।

 (4) 

सड़क पर 
दंगल हो रहा है 
चीखते लोग।

 (5) 
पागल कुत्ता 
ड़रते लोग सभी 
हाथ में डंडा।
 

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