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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



आस के बिरवे को तुम


डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा "अरुण"


           
आस के बिरवे को तुम,मन में सजाए रखना!
आएँगे फूल एक दिन,  नज़रें  गड़ाए  रखना!!
मन में अगर हों हौंसले,
      मंज़िल रहेगी पाँव में!
          चलते रहोगे तुम अगर,
                 धूप में और छाव में!!
छाले भी गर हों पाँव में, चलना बनाए रखना!
आएँगे फूल एक दिन, नज़रें  गड़ाए  रखना!!
गिर के जो उठता नहीं,
       मंज़िल मिलेगी कब उसे?
            चलने की जिसने ठान ली,
                   रोकेगा कौन,कब उसे?
हिम्मत का मूल्य है बहुत, इसको बचाए रखना!
आएँगे फूल एक दिन, नज़रें   गड़ाए   रखना!!
अधरों पे हो मुस्कान गर,
           आसान होता है सफर
                  मन में रहें जो हौंसले,
                        काफूर हो जाता है डर!!
चलना ही तो है ज़िंदगी, दिल को बताए रखना!
आएँगे फूल एक दिन, नज़रें   गड़ाए   रखना!!
                  

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